मैं टिंकू...
मैं टिंकू, मेरी माँ का नाम मम्मी तथा पिताजी का नाम पप्पा! मेरा नाम ट्विन्कल, पर सभी मुझे टिंकू कहके ही बुलाते है! मैं 'स्टॅण्डर्ड सेकंड' मे पढती हूं, होम वर्क के कारण आज मुझे काफी टेन्शन आया है! मम्मी ऑफिस गयी है और पप्पा उनकी कंपनी मे... अब मुझे कौन मदद करेगा? टेन्शन आया की मैं अपने दादाजी की बताई हुई बातें याद करती हूं! उन्ही बातों मे से एक किस्सा आपको बताना चाहती हूं...
दादाजी ने बताया था, उनके बचपन मे वह दोस्तो के साथ काफी बडे मैदान मे जाकर खेलते थे! उस वक्त उनको ना पढाई का टेन्शन था ना होम वर्क का! खाने का समय हुवा की उनकी माँ उन्हे ढुंढती हुई मैदान पर आती थी... सही मे, मुझे दादाजी ने स्वयं बताया था! फिर दादाजी अपनी माँ के साथ चुपके से खाना खाने घर जाते थे! बाद मे शामको सब दोस्त मिलकर बगिचे मे जाते थे, कभी कभी उनके साथ उनके पापा या चाचा हुवा करते थे! दादाजी को गेंद के साथ खेलना बहोत अच्छा लगता था पर उस वक्त गेंद खरीदने उनके पास पैसे कहां से आते? वह अपने पापा से पैसे मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पाते! किसी दिन किसी दोस्त ने कभी गेंद लाई तो फिर क्या कहना... पसीना पसीना होने तक गेंद खेलते रहना, बगिचा बंद होने तक!
आज मेरे पास मम्मी, पप्पा ने दिये हुवे इतने पैसे है, खिलोने भी ढेर सारे है... गेंद तो एक क्या, चार पांच तो होगी ही! मगर खेलूं तो खेलूं किसके साथ? इन बेजुबान दिवारों के साथ या दरवाजों, खिडकियों के साथ? सभी दोस्त अपने अपने घरों मे पढाई या होम वर्क मे डुबे रहते है! किसीको बाहर निकलने की घडीभर की भी फुरसत नहीं, कसमसे!
मुझे आजकल दिलसे ऐसा लगता है, अपने दादाजी की तरह खूब खेलना चाहिये, मस्त घुमना फिरना चाहिये, मैदान मे जाकर खूब भागना चाहिये... पुरी तरह थकने तक! कहीं दूर जाकर डुबते सूरज का आनंद लेते बैठे रहना और फिर मम्मी ने मुझे ढुंढते हुवे वहाँ पहुंचना, बादमे उसने प्यार से अपने पास लेना... सही मे मुझे ऐसा रह रह के लगता है, दिलसे कहती हूं मैं!
घर मे टीव्ही शूरू किया तो उसमे हर कोई आपस मे बातें करते रहते है, मुझसे कोई बात ही नहीं करता... क्यो मैं उनकी बातें सुनू , वह हमेशा झगडते रहते है! और आजकल कार्टून भी बोअर करते है, फिर मैं टीव्ही बंद करके हमारी गॅलरीसे नीचे की गलीमे कुत्ते के बच्चे देखती रहती हूं! वो मुझे बहोत अच्छा लगता है! परसो मैने एक कुत्ते का बच्चा अपने घर लानेकी जिद की तो पप्पा बोलें... 'खबरदार, फिरसे कभी कुत्ते का नाम लिया तो तुम्हारी टांग तोडकर हाथ मे दे दूंगा!' उस रात सहीमे मुझे नींद नही आई, बार बार कुत्तेका बच्चा नजर के सामने आता रहा! कुछ देरके बाद अपनी आंखे मुंद ली, तो बडेसे मैदान मे दादाजी दौडतें हुवे दिखाई दिये और उनके साथ कुत्ते का बच्चा भी दौड रहा था! वह सब देखकर मेरी आंखे भर आई मगर नींद नही आई!
सुबह उठकर देखा तो पप्पा पहले ही बाहर गये थे और मम्मी उसके काम मे लगी हुई थी! मैने मम्मी से कहा, 'मम्मी मैं आज स्कुल नहीं जाऊंगी, मेरे पेट मे कुछ गडबड है' उसपर मम्मी अचानक भडक कर बोली... ''तेरी ऍडमिशन के लिये हजारो रुपियोंका डोनेशन दिया हमने और तुझे छुट्टी मारना है! चल जल्दीसे तय्यार होना है तुझे, मेरा दिमाग मत खा टिंकू!'
पता नही क्यो इतने मे मम्मी ठिकसे बात भी नहीं करती मुझसे, पप्पा के साथ झगडा हुवा था इसीलिये शायद! कभी भी दादी दादाजी जैसे प्यार से पास लेकर बातें नहीं करती मम्मी... अब मैं क्या करू? किससे बात करू? पप्पा को कहा, हम संडे को दादाजी के गांव जायेंगे, तो उन्होने साफ इन्कार कर दिया!
अब मैने मन ही मन फैसला कर लिया है, दादाजी आयेंगे तो उन्हे अपनी दिलकी बातें जरूर बताऊंगी! स्कुल की एक्झाम के बाद धुपकाले की छुट्टीयां लगेगी तब मुझे अपनी मर्जीसे खेलना है... उस वक्त दादाजी जरूर आयेंगे, उनके पीछे लगकर गांव जाना है मुझे! फिर उधर गांवकीही स्कुल मे मेरा ऍडमिशन कराने के लिये मैं दादाजी को मना लुंगी! वैसे भी इधर मम्मी, पप्पा मेरे होम वर्क पर कभी ध्यान नही देते, दिवाली की छुट्टीयों मे दादाजीने पढायी हुई कविताए मुझे आज भी याद है! गांव की स्कुल मे मेरा ऍडमिशन हो गया तो कितना अच्छा होगा, हर रोज दादाजी मुझे स्कुल छोडने आयेगे! उस वक्त उनके साथ मस्त घुमते हुवे स्कुल जाने मे बहोत मजा आएगा... यहां स्कुलबस की राह देखते हुवे उब जाती हूं मैं, ढेरसारी गाडीयों के आवाज से काफी परेशानी भी होती है! ये सब गांव मे नही होगा, वहां के माहोल मे कुछ तो सुकून मिलेगा!
छुट्टी के दिन दादाजी के साथ गांव की नदीके किनारे सैर करने जाया करुंगी, वहांकी सहेलीयों के साथ खूब खेलूंगी! सचमुछ ऐसा होगा ना? मैने दिलमे जो सोच रखा है वैसा होना चाहिये, क्यो नहीं होगा? मैं जो भगवान से रोज दिलसे प्रार्थना करती हूं! दादाजी कहते है... 'हम अगर दिलसे, सच्ची लगन से भगवान की प्रार्थना करते है तो वह जरूर सुनता है!'
मैं भगवान से तहे दिलसे प्रार्थना करती हूं, बिनती करती हूं, 'मेरे दादाजी को यहां मेरे पास जल्द से जल्द भेजे और मैने जो चाहा है, मेरी मनोकामना पुरी करे!'
विनोद श्रा. पंचभाई
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