*मुझे दीदी चाहिये...*
गोलू पाच साल का था। गोलू के पास ढेर सारे खिलौने थे...गाडी, ट्रक, रोबोट इत्यादी l मगर वह जल्दीही बोअर हो जाता था!
एक दिन गोलू ने उसने मम्मी से कहा...
"मम्मी, मुझे ना दीदी चाहिये।"
मम्मी हंसते हुए बोली...
"अरे बेटा गोलू! तुम्हारे पास इतने सारे खिलौने हैं, वो तुम अकेलेही खूब खेल सकते हो फिर दीदी की क्या जरुरत है?"
उसपर गोलू मुँह बनाकर बोला... "ये सब खिलौने बोलते तो ही नहीं... दीदी होती तो मेरे साथ खूब बातें करती ना।"
शाम को पापा ऑफिस से घर आतेही गोलू भागकर उनके पास गया और बोला...
"पापा, पापा आप मुझे दीदी लाकर देंगे ना? बताओ ना पापा!"
पापा मुस्कुराते हुए बोले...
"अरे बेटा, दीदी कोई खिलौना तो नहीं है... जो तुमको दुकान से खरीद कर लाकर दें।"
गोलू नाराज़ होकर बोला...
"तो फिर मुझे कोई नहीं समझ पाता... आप भी नहीं और मम्मी भी नहीं!" इतना कहकर, गोलू उदास होकर खिड़की से बाहर देखने लगा। तभी सामने वाले घर से नेहा दीदी बाहर निकली। वह करीबन आठ साल की थीं और अक्सर बाहर खेलती रहती!
गोलू की ओर ध्यान जाते ही नेहा दीदी पास आकर बोली...
"अरे गोलू, क्यों ऐसे उदास बैठे हो?"
गोलू धीरे से बोला... "मुझे ना दीदी चाहिये... मगर यहां किसी के पास नहीं है।"
नेहा दीदी हंसकर बोली... "तो मैं हूँ ना! चलो, हम साथ खेलते हैं।"
उस दिन से नेहा दीदी रोज गोलू के साथ खेलने लगीं। कभी वो उसे कहानी सुनाती थी... कभी पढ़ाई में मदद करती, तो कभी पास के झूले पर साथ झूलती थी!
एक दिन बारिश हो रही थी। गोलू खिड़की से बाहर की ओर देख रहा था। उतने मे नेहा दीदी छाता लेकर उसके घर आईं और बोलीं...
"चलो गोलू, हम बारिश में कागज़ की नाव तैराते है!"
वह सुनते ही गोलू उछल पडा... फिर दोनों ने मिलकर कागज की छोटी-छोटी नावें बनाई और बरामदे के पानी में तैराने लगे! उस वक्त गोलू बहोत खूश दिख रहा था!
फिर एक दिन गोलू खुशी खुशी से अपने मम्मी-पापा से बोला...
"देखो मम्मी, पापा! अब मुझे मेरी दीदी मिल गई! नेहा दीदी ही मेरी असली दीदी है।"
उसपर पापा हंसते हुए बोले...
"हां हां क्यो नहीं! बेटा सच्ची दीदी वही होती है, जो तुम्हें प्यार करती हो और मुसीबत मे भी साथ दे।"
उतने मे नेहा दीदी वहां उनके पास आ पहुंची... गोलू ने झटसे नेहा दीदी का हाथ पकड़कर कहा...
"अब मैं कभी अकेला नहीं रहूँगा... क्योंकि मेरी दीदी मेरे पास है!"
संदेश... रिश्ते केवल जन्म से नहीं, सिर्फ अपने खून से ही नहीं... तो अपनापन और प्यार से भी बनते हैं!
विनोद श्रा. पंचभाई, पुणे
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